,एकता या अनेकता

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हमारी नियति

Posted On: 6 Nov, 2012  
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आम आदमी

Posted On: 28 Sep, 2012  
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सर्वशक्तिमान /ईश्वर

Posted On: 21 Sep, 2012  
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जनतंत्र और हमारा संविधान.

Posted On: 19 Sep, 2012  
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हमारे ये नेतागन

Posted On: 6 Sep, 2012  
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बात तब बनेगी गी जब……..

Posted On: 30 Aug, 2012  
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देश को पटरी पर लाना ज़रूरी है.

Posted On: 28 Aug, 2012  
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क्या होगया इस देश को?

Posted On: 22 Aug, 2012  
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एकता या अनेकता

Posted On: 10 Aug, 2012  
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Hello world!

Posted On: 9 Aug, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वर्तमान परिस्थितियों पर अच्छा आलेख, साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! "आज देश पूरी तरह भ्रष्ट तंत्र बनकर रह गया है. ऐसे में हमें बड़ी गंभीरता से सोचना होगा किक्या हम आज की व्यवस्था को ऐसे ही चलने देंगे या उठ कर इसमें बदलाव करने की चेष्टा करेंगे. जब हम व्यक्तिपूजक हैं तो क्यों नहीं राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था को अपनाए जो हमारी सोच के अधिक नज़दीक हो? कहना न होगा की आज हम इतिहास के उस स्थान पर खड़े हैं जहां औरंगजेब की मृत्यु के बाद देश खडा हुआ था. अंग्रेजी शासन में हमें कमसे कम यह सोचने का तो अवसर मिलही किहमे एक स्वतंत्र देश बनाना चाहिए. अब अगर हम अपनी स्वतंत्र के बाद पैशाचिक लोगों की गिरफ्त में आजायें तो यह हमारी ही कमी होगी और हमारा दुर्भाग्य."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun




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